E-177, First Floor, Amar Colony, Lajpat Nagar-IV, New Delhi info@missionmeradesh.com
Follow us:
;

Popular Post


ब्लॉग

देश को खाद्यान्न संकट में धकेल देगा ‘प्राकृतिक खेती’ का दबाव


देश को खाद्यान्न संकट में धकेल देगा ‘प्राकृतिक खेती’ का दबाव


Posted By: Ameeta  |  Posted Date: 02-10-2025

    देश में ईरान अमेरिका युद्ध के बाद से रासायनिक खादों के उपयोग को कम करने और जैविक अथवा प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने की चर्चा तेज़ हुई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी कई मंचों से किसानों से “धरती मां को रसायनों से बचाने” और प्राकृतिक खेती अपनाने की अपील कर चुके हैं। सरकार का तर्क है कि रासायनिक खादों के अत्यधिक उपयोग ने मिट्टी की उर्वरता घटाई है, भूजल को प्रदूषित किया है और खेती की लागत बढ़ाई है। यह चिंता पूरी तरह निराधार नहीं है।  पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश जैसे क्षेत्रों में वर्षों तक अंधाधुंध यूरिया और डीएपी के प्रयोग ने मिट्टी के जैविक तत्वों को कमजोर किया है। लेकिन असली प्रश्न यह है कि क्या बिना किसी ठोस और व्यवहारिक विकल्प के रासायनिक खादों का इस्तेमाल कम करना संभव है? और यदि ऐसा जल्दबाज़ी में किया गया तो क्या देश की खाद्य सुरक्षा पर खतरा खड़ा हो सकता है?

   भारत की कृषि व्यवस्था आज भी बड़े पैमाने पर रासायनिक खादों पर निर्भर है। हरित क्रांति के बाद गेहूं और धान की रिकॉर्ड पैदावार जिस मॉडल पर खड़ी हुई, उसकी रीढ़ यूरिया, डीएपी और पोटाश जैसे उर्वरक रहे हैं। लगभग 140 करोड़ की आबादी वाले देश में खाद्यान्न उत्पादन को स्थिर बनाए रखना कोई आसान चुनौती नहीं है। 

   किसान इसलिए खाद का प्रयोग नहीं करता कि उसे ज़हर फैलाने का शौक है, बल्कि इसलिए करता है क्योंकि उसे अपनी जमीन से उतनी उपज चाहिए जिससे परिवार चले, कर्ज चुक सके और बाजार में टिक सके। यदि सरकार कहती है कि किसान रासायनिक खाद कम करे, तो उसके सामने पहला सवाल यही उठता है कि “फिर पैदावार कैसे बचाई जाएगी?”

   यहीं पर नीति और ज़मीन के बीच सबसे बड़ा अंतर दिखाई देता है। प्राकृतिक खेती और जैविक खेती सुनने में आकर्षक अवधारणाएं हैं, लेकिन इन्हें व्यापक स्तर पर लागू करना अत्यंत कठिन और समय लेने वाला कार्य है। जैविक खेती में मिट्टी को पुनर्जीवित होने में कई वर्ष लग सकते हैं। शुरुआती दौर में उत्पादन घटता है, लागत बढ़ती है और बाजार में जैविक उत्पाद का उचित मूल्य मिलना भी निश्चित नहीं होता। बड़े किसान किसी तरह यह प्रयोग कर सकते हैं, लेकिन भारत का अधिकांश किसान छोटा और सीमांत है, जिसके पास जोखिम उठाने की क्षमता नहीं है। वह एक खराब सीजन भी झेलने की स्थिति में नहीं है।

   कृषि वैज्ञानिक भी मानते हैं कि रासायनिक खादों का संतुलित उपयोग जरूरी है, न कि उनका अचानक त्याग। समस्या खाद के अस्तित्व में नहीं, बल्कि उसके असंतुलित और अंधाधुंध प्रयोग में है। कई क्षेत्रों में किसान जरूरत से अधिक यूरिया डालते हैं क्योंकि वह सस्ती मिलती है और तत्काल हरियाली दिखाती है। इससे मिट्टी में नाइट्रोजन तो बढ़ती है, लेकिन सूक्ष्म पोषक तत्व घटने लगते हैं। समाधान यह होना चाहिए कि किसानों को “संतुलित पोषण प्रबंधन” सिखाया जाए, मिट्टी परीक्षण को अनिवार्य और आसान बनाया जाए, तथा जैविक और रासायनिक उर्वरकों के बीच संतुलन स्थापित किया जाए। लेकिन सरकार और नीति निर्माता कई बार ऐसे संदेश देते दिखाई देते हैं मानो रासायनिक खाद पूरी तरह दुश्मन हो। 

   सबसे बड़ा संकट यह है कि अभी तक देश में ऐसा कोई व्यापक और सस्ता वैकल्पिक मॉडल विकसित नहीं हुआ है जो रासायनिक खादों की बराबरी कर सके। गोबर खाद, वर्मी कम्पोस्ट, जीवामृत या प्राकृतिक खेती के अन्य मॉडल सीमित स्तर पर उपयोगी हो सकते हैं, लेकिन करोड़ों टन खाद्यान्न पैदा करने वाले देश में उनकी उपलब्धता, परिवहन और प्रभावशीलता अपने आप में बड़ा प्रश्न है। यदि पूरे देश की खेती को जैविक मॉडल पर ले जाना हो तो पशुधन, जैविक संसाधनों और श्रम की जो मात्रा चाहिए, वह वर्तमान ढांचे में संभव नहीं दिखती। ऐसे में यदि रासायनिक खादों को हतोत्साहित किया गया और विकल्प समय पर विकसित नहीं हुए, तो उत्पादन में गिरावट आना लगभग तय माना जाएगा।

   यह चिंता केवल किसानों तक सीमित नहीं है। खाद्यान्न उत्पादन घटने का सीधा असर महंगाई, आयात निर्भरता और राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा पर पड़ेगा। भारत पहले ही खाद और कच्चे माल के आयात पर भारी विदेशी मुद्रा खर्च कर रहा है। यदि उत्पादन घटा तो सरकार को अनाज भी आयात करना पड़ सकता है। इससे गरीब उपभोक्ता और अधिक प्रभावित होंगे। विडंबना यह है कि एक ओर सरकार खाद पर लाखों करोड़ की सब्सिडी देती है, दूसरी ओर किसानों को यह संदेश भी देती है कि वे खाद कम करें। यह दोहरी नीति भ्रम पैदा करती है।

   दरअसल, भारत को किसी एक छोर पर जाने की आवश्यकता नहीं है। न तो अंधाधुंध रासायनिक खेती टिकाऊ है और न ही बिना तैयारी के पूर्ण प्राकृतिक खेती संभव है। आवश्यकता “संतुलित कृषि मॉडल” की है, जहां वैज्ञानिक तरीके से रासायनिक खादों का सीमित और विवेकपूर्ण उपयोग हो, साथ ही जैविक तत्वों को धीरे-धीरे बढ़ाया जाए। किसानों को तकनीक, प्रशिक्षण, बाजार और आर्थिक सुरक्षा दिए बिना केवल नैतिक अपीलों से खेती का ढांचा नहीं बदल सकता।

   कृषि केवल पर्यावरण का विषय नहीं, बल्कि भूख, रोजगार और राष्ट्रीय स्थिरता का भी प्रश्न है। यदि नीति निर्माण भावनाओं और नारों के आधार पर होगा, तो उसका सबसे बड़ा खामियाजा किसान और आम उपभोक्ता दोनों को भुगतना पड़ेगा। इसलिए सरकार को चाहिए कि वह रासायनिक खादों के खिलाफ वातावरण बनाने के बजाय व्यवहारिक संक्रमण नीति तैयार करे। जब तक मजबूत विकल्प तैयार न हों, तब तक खादों के उपयोग में कटौती का दबाव खेती को सुधारने के बजाय संकट में भी डाल सकता है। 


;